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बड़े काम का है इश्क

बड़े काम का है इश्क इश्क।  एक सुकून जो मन पर टपकता है। जलते हुए मन पर पानी सा। मन की यह खोज हमें पता नहीं होती और अचानक जब ये खत्म होती है, तो आप महसूस कर रहे होते हैं कुछ भाप बनकर उड़ रहा है। एक गम, जिसे आप बुझता हुआ महसूस करते हैं। मन पर तेजी से एक राहत झर रही होती है। अंदर एक चुप, एक खामोशी खत्म होती है। मन में एक सन्नाटा टूटता है। एक ठंडी हवा सा झोंका गम की पिघलन से आपको छुड़ाता है।  आपके इर्द-गिर्द एक सुकूनी घेरा बनता है। अब गमों को बार-बार खाली हाथ लौटना पड़ता है। पलकें ढलती हैं। आंखों में हसीन सपने तैरने लगते हैं। होठों पर तन्हा उम्मीदें मुस्कुरा उठती हैं। मन ठहाकों से खनकता है, लेकिन बिना शोर के। एक ऐसा एहसास जिसे आप  इश्क  या कुछ भी कह लें।  अंदर होती है क्रांति आपके अन्दर बहुत कुछ टूटना-फूटना शुरू होता है। अंदर एक शांत क्रांति होती है, जिसमें आप फिर से बनते हैं, आपका फिर से निर्माण होता है। आप फिर से तराशे जाते हैं। आपके अंदर का इंसान खूबसूरत आकार लेने लगता है।  हां, गम, गुस्सा और आंसू  प्यार  के स्थाई भाव हैं। यहा...

जन आंदोलनों की विफलता कब तक?

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जन आंदोलनों की विफलता कब तक? जब सरकारें या सत्ताएं लोगों के अधिकार सुनिश्चित करने में विफल होती हैं और इससे लोगों में असंतोष बढ़ता है तो आंदोलन आखिरी रास्ता होता है। आंदोलन से आदमियत की नई स्थापना होती है। यह व्यवस्था के लुंज-पुंज पुर्जों को ठीक करता है या फिर पूरी व्यवस्था को ही बदल देता है। झुंड, कबीले, राजतंत्र, लोकतंत्र के अपने अलग-अलग चरणों में पूरी मानव सभ्यता संघर्ष और आंदोलन का ही नतीजा है। फिलहाल, यहां आजादी के पहले और उसके बाद मोटे तौर पर पांच बड़े जन आंदोलनों के हश्र और हासिल की पड़ताल करते हैं। अंग्रेजों के खिलाफ कांग्रेस का आंदोलन और इसके बाद मोटे तौर पर कांग्रेस के ही खिलाफ लोहिया, नक्सलबाड़ी, जेपी और लगभग पांच साल पहले अन्ना हजारे का आंदोलन। इन आंदोलनों से बनी सभी पार्टियों का अंजाम  देखें, तो पाएंगे सबको सिस्टम लीलता गया या कहें सभी  सिस्टम की बगलगीर होती गईं। कांग्रेस का आंदोलन आजादी की लड़ाई के सफल आंदोलन के बाद कांग्रेस का जन्म हुआ, लेकिन आजादी के सपने पूरे करने में वह विफल रही। इस नाकामी का केन्द्रीय कारण उसे ही कहना पड़ेगा, क्योंकि पहली जिम्मे...

राजनीति का भक्ति और झाड़-फूक काल।

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राजनीति का भक्ति और झाड़-फूक काल। ‌आप प्रवचन से ईश्वर का अनुभव करने की कोशिश किए होंगे या अकेले में बैठकर ईश्वर का ध्यान लगाए होंगे। आप आंखें बंद करते हैं और बिना किसी आकार वाले या फिर किसी काल्पनिक आकार वाले ईश्वर की कल्पना करते हैं। आप यहां तक कल्पना करते हैं कि वह बिल्कुल आपकी तरह सजीव है और उसमें असीम शक्ति , असीम सोच , सर्वज्ञ , सर्व शक्तिमान है। ये सब आप काल्पनिक तौर पर करते हैं और इसी पर पूरा यकीन कर उस काल्पनिक सर्वसत्ता से विनती करते हैं , याचना करते हैं , उसकी वंदना करते हैं। उससे बहुत कुछ मांगते हैं। गलतियों पर उससे माफी भी मांगते हैं। अपनी नाकामियों पर उससे काल्पनिक शक्ति प्राप्त करते हैं और काल्पनिक तौर पर आप पहले से अधिक उर्जा महसूस करते हैं।     अभी राजनीति का हाल भी कुछ ऐसा ही है। भक्ति में जैसा कुछ होता हुआ लगता है वैसे अभी राजनीति में कुछ होते हुए लग रहा है। कुछ बताया जा रहा है , लेकिन करके दिखाया नहीं जा रहा? अगर दिखाया भी जा रहा है तो तंत्र-मंत्र की तरह। मतलब कुछ कवायद करते दिखाया जा रहा है और बताया जा रहा है कि इसी से आपका कुछ होग...

मरता किसान जिनके राष्ट्रवाद में नहीं!

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मरता किसान जिनके  राष्ट्रवाद में नहीं !   सूखा आदमी पर सदियों से आफत बन रहा है।   यह किसी एक देश की नहीं , बल्कि दुनिया की समस्या है। अमेरिका, फ्रांस, चीन, जापान, रूस, अफ्रीका, भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान ये दुनिया के हर हिस्से में पड़ता है। आस्ट्रेलिया ने लगातार 7 साल सूखा झेला है।    महाराष्ट्र में पिछले कुछ सालों में जान देने वाले किसानों के आंकड़ों पर नजर डालते हैं। 2009 में 1,600 किसानों ने जान दी। ये संख्या 2010 में बढ़कर 1,740 हो गई। हालांकि, 2011 में ये संख्या घटी और 1495 मौतें हुईं, 2012-13 में 1467, 1298 रही। लेकिन 2014 में तेजी से बढ़कर 1,949 और 2016 सितम्बर तक ये संख्या 2,016 तक पहुंच गई। सितम्बर में विदर्भ में 1,010 और मराठवाड़ा में 695 किसानों ने जान दी।          महाराष्ट्र में पिछले तीन साल का सूखा अचानक आई आपदा नहीं। सूखा अपनी तमाम शर्तों और पहचान के साथ आता है, इसलिए आधुनिक युग में अपने सुप्रबंधन से इससे आसानी से निपटा जा सकता है, बशर्ते कि ये निपटने वाले की संवेदना में हो। गुजरात के भुज में 2001 में आए ...

हिल गया अरब क्या होगा अंजाम?

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सबसे पहले ट्यूनिशिया में तानाशाही व्यवस्था के खिलाफ जैन सैलाब उमड़ा। उसके बाद मिश्र, लीबिया और अब यमन में लोग सड़कों पर उतर आयें हैं इससे  अरब जगत पूरी तरह हिल उठा है। जानकारों ने इन्हें 1977 के ब्रेड सब्सिडी विरोधी अरब इतिहास के सबसे बड़े प्रदर्शन से जोडऩे लगे है। ट्यूनिशिया में जन दबाव के आगे राष्ट्रपति जैनुल आव्दीन बेन अली को देश छोडक़र भागना पड़ा। आब्दीन 1987 से ही ट्यूनिशिया की सत्ता पर काबिज रहे हैं। ट्यूनिशिया में आन्दोलन एक युवा फल व्यापारी मोहम्मद बुवाजिजी द्वारा सरे चौराहे पर आत्महत्या करने के बाद शुरू हुई। इस फल व्यापारी ने पुलिस अत्याचार से तंग आकर आत्महत्या जैसा कदम उठाया था। उसके बाद देश में सरकार खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए। जिन्होंने बाद में दंगों की शक्ल अख्तियार  कर ली। और इसका अंजाम यह  हुआ कि वहां 23 साल से सत्ता पर जमे रहने वाले राष्ट्रपति बेन अली को देश छोडक़र भागना पड़ा। ट्यूनिशिया के बाद मिश्र में भी हुस्नी मुबारक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुआ। हुस्नी मुबारक मिश्र पर 1981 से शासन कर रहे है। उन पर हमेशा ही अपने विरोधियों के साथ सख्ती से निपटने के...

प्रधानमंत्री का क्या होगा?

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 यह देश गां यह देश गांधी जी के तीन बंदरों में बड़ा विश्वास करता है। और शायद यही कारण है कि इस देश को गूंगा, बहरा और अंधों का देश कहा जा सकता है। गांधी जी के तीन बंदरों में से एक बुरा नहीं देखता है। इसलिए वह सदा अपनी आंखो पर हाथ रखे रहता है। दूसरा बुरा नहीं सुनता है, इसलिए वह सदा अपने कानों को बंद किए रहता है। तीसरा बंदर बुरा नहीं कहता है, इसलिए वह सदा अपने ही हाथों से अपना मुंह बंद किए रहता है। प्रंधानमंत्री, गांधी जी के दो शुरुआती बंदरों का मिला जुला संस्करण बन गए है। बेशक वे बहुत अच्छे और बेदाग इन्सान हैं । देश लेकिन सारे घोटाले उनकी नाक के नीचे हो रहे हैं ये कहाँ तक जायज है? उन्हे ना तो अपनी सरकार में कुछ बुरा दिखता है। और ना ही वें उसके बारे में कुछ सुनना चाहते है। इसलिए उन्होने अपनी आंखे और कान अपने ही हाथों से बंद कर लिए है। अपनी सरकार के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कुछ कहने के मामले में माननीय मनमोहन सिंह गाँधी जी के तीसरे बंदर का बखूबी अनुसरण कर रहें हैं।               पूरी कांग्रेस पार्टी कह रही है कि प्रधानमंत्री...