मरता किसान जिनके राष्ट्रवाद में नहीं!
मरता किसान जिनके राष्ट्रवाद में नहीं!
सूखा
आदमी पर सदियों से आफत बन रहा है। यह किसी एक देश की
नहीं, बल्कि दुनिया की समस्या है। अमेरिका, फ्रांस, चीन, जापान, रूस, अफ्रीका, भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान
ये दुनिया के हर हिस्से में पड़ता है। आस्ट्रेलिया ने लगातार 7 साल सूखा
झेला है।
महाराष्ट्र में पिछले कुछ सालों में जान देने वाले किसानों के आंकड़ों पर नजर डालते हैं। 2009 में 1,600 किसानों ने जान दी। ये संख्या 2010 में बढ़कर 1,740 हो गई। हालांकि, 2011 में ये संख्या घटी और 1495 मौतें हुईं, 2012-13 में 1467, 1298 रही। लेकिन 2014 में तेजी से बढ़कर 1,949 और 2016 सितम्बर तक ये संख्या 2,016 तक पहुंच गई। सितम्बर में विदर्भ में 1,010 और मराठवाड़ा में 695 किसानों ने जान दी।
महाराष्ट्र में पिछले तीन साल का सूखा अचानक आई आपदा नहीं। सूखा अपनी तमाम शर्तों और पहचान
के साथ आता है, इसलिए आधुनिक युग में अपने सुप्रबंधन से इससे आसानी से निपटा जा
सकता है, बशर्ते कि ये निपटने वाले की संवेदना में हो। गुजरात के भुज में 2001 में
आए भूकंप, उड़ीसा में 1999 में आए साइक्लोन जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने में देश
अपनी क्षमता दिखा चुका है, लिहाजा इतना बड़ा देश इस तरह की समस्या से आसानी से कई
साल तक निपट सकता है।
सरकार का जागना
खैर, स्वराज अभियान की पहल के बाद सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार की दिलचस्प दलील पर गौर फरमाते हैं। कोर्ट पूछता है कि आप ने अब तक महाराष्ट्र में सूखे से निपटने के लिए क्या किया? क्या इस समस्या का एहसास आपको है? आश्चर्य की बात है कि बेबस सरकार की तरफ से पेश पक्षकार के पास ठीक से कोई जवाब नहीं था। सरकार सूखे से निपटने के कोई उपाय नहीं बता पाई, जो कुछ दलील उसने दिया भी उसका वह सबूत नहीं दे पाई। जबकि सूखा पीड़ित एरिया का एक अनपढ़ आदमी चुटकियों में हल बनाकर दे देगा, लेकिन सरकार बिना उपाय के नजर आई। वजह ये कि सरकार ने कुछ किया ही नहीं है। सरकार तो मनरेगा के तहत कराये काम का पैसा अभी तक नहीं चुका पाई है।
खैर, स्वराज अभियान की पहल के बाद सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार की दिलचस्प दलील पर गौर फरमाते हैं। कोर्ट पूछता है कि आप ने अब तक महाराष्ट्र में सूखे से निपटने के लिए क्या किया? क्या इस समस्या का एहसास आपको है? आश्चर्य की बात है कि बेबस सरकार की तरफ से पेश पक्षकार के पास ठीक से कोई जवाब नहीं था। सरकार सूखे से निपटने के कोई उपाय नहीं बता पाई, जो कुछ दलील उसने दिया भी उसका वह सबूत नहीं दे पाई। जबकि सूखा पीड़ित एरिया का एक अनपढ़ आदमी चुटकियों में हल बनाकर दे देगा, लेकिन सरकार बिना उपाय के नजर आई। वजह ये कि सरकार ने कुछ किया ही नहीं है। सरकार तो मनरेगा के तहत कराये काम का पैसा अभी तक नहीं चुका पाई है।
बड़ा शर्मनाक है कि सरकार जगने के लिए कोर्ट के डंडे का
इंतजार कर रही थी। जगी सरकार अब टीवी चैनलों पर अपने प्रवक्ताओं को भेजकर बिना
सबूत के झूठी दलीलें पेश कर रही है। इस लिहाज से स्वराज अभियान की कार्यवाही
काबिले तारीफ है, जिसने प्रभावित इलाकों में जाकर सर्वे किया और 3-4 महीने पहले ही
रिपोर्ट राज्य सरकारों को दिया था, बावजूद सूखा प्रभावित राज्यों की सरकारें
अनदेखी कर रहीं थीं।
सूखा कोई भेदभाव नहीं करता, सबके लिए आता
है।
केन्द्र सरकार के केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौ. बीरेन्द्र सिंह का टीवी पर दिया बयान बड़ा हास्यास्पद है। चौ. साहब कह रहे हैं कि हमने मनरेगा के तहत जो 100 दिन के काम की गारंटी थी, उसे बढ़ाकर 150 दिन कर दिया है। अब इन साहब से कौन पूछे कि मनरेगा तो बीपीएल परिवारों के लिए है। सूखा तो अमीर-गरीब सबके लिए आता है। गरीब के पास ना तो ज्यादा खेत होता है और ना ही उसका कृषि में ज्यादा निवेश। सूखे से ज्यादा बर्बादी उस किसान की होती है, जिसके पास ज्यादा खेत होता है और जिसका खेती में ज्यादा निवेश हो।
लिहाजा, मनरेगा से एक गांव की आबादी के लगभग 25 फीसदी या ज्यादा से ज्यादा 30 फीसदी बीपीएल आबादी को फायदा होता है, बाकि 70 फीसदी सूखे से बर्बाद किसान के लिए मनरेगा किस काम की?
मनरेगा को बताया था भ्रष्टाचार का स्मारक
ध्यान देने वाली बात है की पीएम ने कांग्रेस की इस योजना को भ्रष्टाचार का स्मारक बताया था। उन्होंने कहा था इस योजना को मैं इसलिए नहीं खत्म कर रहा, ताकि पिछली सरकार के भ्रष्टाचार का स्मारक और ऊंचा हो। लेकिन आज इसी योजना को सरकार उपाय के तौर पर पेश कर इसके तहत काम की समयसीमा बढ़ा रही है, सरकार के पास अपना कोई उपाय ही नहीं!
सच तो ये है के वर्तमान सरकार की संवेदना में किसान, मजदूर, गरीब हैं ही नहीं। भारत माता की जय में किसान की जय नहीं। मरता किसान इनके राष्ट्रवाद में नहीं!
केन्द्र सरकार के केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौ. बीरेन्द्र सिंह का टीवी पर दिया बयान बड़ा हास्यास्पद है। चौ. साहब कह रहे हैं कि हमने मनरेगा के तहत जो 100 दिन के काम की गारंटी थी, उसे बढ़ाकर 150 दिन कर दिया है। अब इन साहब से कौन पूछे कि मनरेगा तो बीपीएल परिवारों के लिए है। सूखा तो अमीर-गरीब सबके लिए आता है। गरीब के पास ना तो ज्यादा खेत होता है और ना ही उसका कृषि में ज्यादा निवेश। सूखे से ज्यादा बर्बादी उस किसान की होती है, जिसके पास ज्यादा खेत होता है और जिसका खेती में ज्यादा निवेश हो।
लिहाजा, मनरेगा से एक गांव की आबादी के लगभग 25 फीसदी या ज्यादा से ज्यादा 30 फीसदी बीपीएल आबादी को फायदा होता है, बाकि 70 फीसदी सूखे से बर्बाद किसान के लिए मनरेगा किस काम की?
मनरेगा को बताया था भ्रष्टाचार का स्मारक
ध्यान देने वाली बात है की पीएम ने कांग्रेस की इस योजना को भ्रष्टाचार का स्मारक बताया था। उन्होंने कहा था इस योजना को मैं इसलिए नहीं खत्म कर रहा, ताकि पिछली सरकार के भ्रष्टाचार का स्मारक और ऊंचा हो। लेकिन आज इसी योजना को सरकार उपाय के तौर पर पेश कर इसके तहत काम की समयसीमा बढ़ा रही है, सरकार के पास अपना कोई उपाय ही नहीं!
सच तो ये है के वर्तमान सरकार की संवेदना में किसान, मजदूर, गरीब हैं ही नहीं। भारत माता की जय में किसान की जय नहीं। मरता किसान इनके राष्ट्रवाद में नहीं!
आरएसएस और बीजेपी के लोग गाय बचाने के लिए कहीं
अनशन कर रहे हैं, कहीं गाय की आदमी से शर्मनाक शादी करा रहे हैं, तो कहीं गाय बचाने
के नाम पर आदमी की जान ले ले रहे। वही गाय माता जो महाराष्ट्र, बुंदेलखंड और आंध्रा जैसे
राज्यों में सूखे के कारण चारा नहीं पा रही। प्लास्टिक, लकड़ी खाने और
मरने को मजबूर है। कैसी फर्जी गाय भक्ति है?
कितना अफसोसनाक है कि महाराष्ट्र के नागपुर, जहां आरएसएस का हेडक्वार्टर है उसी के नाक तले किसान आत्महत्या को मजबूर हैं और इनके कार्यकर्ता इस सवाल में उलझे हैं कि देश का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा होना चाहिए या भगवा! भागवत भारत माता की जय का नारा हर जबां पर हो के सपने में जी रहे हैं और किसान मौत के!
कितना अफसोसनाक है कि महाराष्ट्र के नागपुर, जहां आरएसएस का हेडक्वार्टर है उसी के नाक तले किसान आत्महत्या को मजबूर हैं और इनके कार्यकर्ता इस सवाल में उलझे हैं कि देश का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा होना चाहिए या भगवा! भागवत भारत माता की जय का नारा हर जबां पर हो के सपने में जी रहे हैं और किसान मौत के!
महाराष्ट्र
और बुंदेलखंड की जो तस्वीरें सामने आ रहीं उनमें से एक तस्वीर एेसी है, जिसमें एक किसान सूखे के दर्द से फटी धरती पर खड़ा है। वह हथेली को आंखों की छांव बनाकर आसमान की ओर निहार रहा है, यह दृश्य भयावह है। इस तस्वीर को देखकर लगता है कि उसे अब भी बादलों से ही उम्मीद
है! लेकिन ये बादल भी तीन साल से उसकी उम्मीदों से खेल रहे हैं।
थोड़े से बादल आकर मौसमी छीटें मार जाते हैं और भोले किसान अपनी ढेर सारी फसलों के
दाने खेतों में छींट आते हैं। इस उम्मीद से कि शायद इस मानसून धरती हरी हो जाएगी, लेकिन
उस थोड़ी सी गीली धरती पर दाने उग भी गये तो बादल उन्हें बड़ा करने नहीं आते और
उगे अंकुर सूख जाते हैं। कुछ इलाकों में ठीकठाक बारिश हो भी गई तो फसल को पकने के
लायक बारिश नहीं हो पाती। वहां धरती इतनी ज्यादा प्यासी होती है कि पानी इकट्ठा ही नहीं होने देती!
वहीं, कहीं फसल तैयार होने को हो भी जाए तो बादल आकर पाथर (ओले) बरसा जाते हैं
और हवाएं साथ दे दें, तो तैयार फसल जमीन पर हमेशा के लिए सो जाती है। ये सब किसान लगातार
बर्दाश्त नहीं कर पाता। उम्मीदों पर फिरे सूखे से किसान सूख जाता है और सबसे
अधिक उम्मीदों वाला जीव किसान खुद को खेत में ही, बाग-बगीचे के किसी पेड़ या घर की
छत में हमेशा के लिए टांग देता है। इस तरह महाराष्ट्र, आंध्रा, बुंदेलखंड में भारत माता
के बच्चे मर रहे हैं और उसी मां के कुछ खाते-पीते बच्चे आईपीएल के मैच जैसे तमाम
जश्नों में मस्त हैं!

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