जन आंदोलनों की विफलता कब तक?
जन आंदोलनों की विफलता कब तक?
जब सरकारें या सत्ताएं लोगों के अधिकार सुनिश्चित करने में विफल होती हैं और इससे लोगों में असंतोष बढ़ता है तो आंदोलन आखिरी रास्ता होता है। आंदोलन से आदमियत की नई स्थापना होती है। यह व्यवस्था के लुंज-पुंज पुर्जों को ठीक करता है या फिर पूरी व्यवस्था को ही बदल देता है। झुंड, कबीले, राजतंत्र, लोकतंत्र के अपने अलग-अलग चरणों में पूरी मानव सभ्यता संघर्ष और आंदोलन का ही नतीजा है।
जब सरकारें या सत्ताएं लोगों के अधिकार सुनिश्चित करने में विफल होती हैं और इससे लोगों में असंतोष बढ़ता है तो आंदोलन आखिरी रास्ता होता है। आंदोलन से आदमियत की नई स्थापना होती है। यह व्यवस्था के लुंज-पुंज पुर्जों को ठीक करता है या फिर पूरी व्यवस्था को ही बदल देता है। झुंड, कबीले, राजतंत्र, लोकतंत्र के अपने अलग-अलग चरणों में पूरी मानव सभ्यता संघर्ष और आंदोलन का ही नतीजा है।
फिलहाल, यहां आजादी के पहले और उसके बाद मोटे तौर पर पांच बड़े जन आंदोलनों के हश्र और हासिल की पड़ताल करते हैं। अंग्रेजों के खिलाफ कांग्रेस का आंदोलन और इसके बाद मोटे तौर पर कांग्रेस के ही खिलाफ लोहिया, नक्सलबाड़ी, जेपी और लगभग पांच साल पहले अन्ना हजारे का आंदोलन। इन आंदोलनों से बनी सभी पार्टियों का अंजाम देखें, तो पाएंगे सबको सिस्टम लीलता गया या कहें सभी सिस्टम की बगलगीर होती गईं।
जन आंदोलनों की लाश कंधे पर ढोता बढ़ रहा देश
लोकतांत्रिक राज में कांग्रेस के खिलाफ विफल जन आंदोलनों की फेहरिस्त है। लोहिया के समाजवाद का, संपूर्ण क्रांति, नक्सलबाड़ी और सबसे नया, अभी तक नाकाम आम आदमी के राज का आंदोलन। इन आंदोलनों का अंजाम देखें तो जैसे समंदर की लहर आती है और वापस जाते ही किनारों पर ढेरों कचरे छोड़ जाती है, वैसे ही ये जन सैलाब देश की स्थापित राजनीति के खिलाफ उमड़े, लेकिन जब थमे तो मिला कुछ नहीं, सिवाए कुछ मुर्दा नारों के। इन मरे हुए नारों, उनसे जुड़े सपनों को अपनी आंखों में लिए इस देश का आम आदमी आज भी सोता है, लेकिन हर सुबह पहले जैसी दर्दीली हकीकतें मौजूद होती हैं। कहीं कोई खास तब्दीली नहीं नजर आती। इन आंदोलनों से जनता और सरकार जगी जरूर, लेकिन मकसद पूरा नहीं हुआ।
लोहिया का आंदोलन
लोहिया ने आजादी के बाद देखे गये सपनों की नाकामी के बाद आंदोलन चलाया। सड़कों पर लोगों को एकजुट किया और नेहरू की नीतियों के खिलाफ मार्क्सवाद और गांधीवादी मिश्रित समाजवाद को आजीवन स्थापित करने में लगे रहे। जिस कांग्रेस और उसकी नीतियों के खिलाफ वह आजीवन लड़ते रहे, उन्हीं नीतियों से खुद को लोहिया का वारिस कहने वाले मुलायम सिंह जैसे नेता अक्सर मोल-भाव करते नजर आए। नेहरू जैसे बड़े राजनीतिक कद के खिलाफ जब लोग बोलने से डरते थे, तब लोहिया ने उनके खिलाफ जंग छेड़ दी थी। लोहिया का खुद नेहरू जी बहुत सम्मान करते थे। उन्हें जननेता मानते थे, लेकिन क्या यही बात मुलायम सिंह के बारे में कही जा सकती है? लोहिया के वारिस क्या उनके समाजवाद को आगे बढ़ा पाए? जवाब है नहीं। लोहिया का आंदोलन मुलायम सिंह के 'यम' फैक्टर में बदल जाता है। मुलायम जाति के नेता बनकर रह जाते हैं, लेकिन लोहियावाद आज भी जिंदा है। वह एक सच्चे, परिवर्तनकामी नेता को ताक रहा है।
यहां कांशीराम के सपनों की पार्टी बसपा का भी जिक्र करना वाजिब होगा। सामाजिक न्याय के लिए बनी शोषितों की इस पार्टी में भी कांग्रेस के सारे लक्षण आ गए हैं! न्याय के लिए अन्याय यहां भी जारी है।
आम आदमी के राज का सपना
ताजा तरीन आंदोलन अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल के लिए हुआ। रामलीला मैदान में आंदोलन की शक्ल काफी कुछ जेपी आंदोलन जैसी थी। कांग्रेस-भाजपा, बाकी सभी पार्टियों के नेताओं को चोर, भ्रष्ट बताया गया। आखिर में आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ। पहली बार चुनाव लड़ी, 70 में से 28 सीट जीतकर सभी को चौंका दिया। अपनी शर्तों पर सरकार चलाने की जिद पर जनता से पूछकर कांग्रेस का समर्थन लेकर सरकार बनाई। अपने शुरुआती तीन मुद्दों पर काम करते हुए बिजली के दाम आधे किए और पानी माफ किया। 49 दिन में जनलोकपाल ना पारित होने पर केजरीवाल ने इस्तीफा देकर शहादत का जामा पहना और फिर चुनाव की मांग कर बैठे।
कांग्रेस का आंदोलन
आजादी की लड़ाई के सफल आंदोलन के बाद कांग्रेस का जन्म हुआ, लेकिन आजादी के सपने पूरे करने में वह विफल रही। इस नाकामी का केन्द्रीय कारण उसे ही कहना पड़ेगा, क्योंकि पहली जिम्मेदारी उसी की थी। कांग्रेस, पार्टी बनते ही बदलने लगी थी। बदलने के संकेत पार्टी बनने से पहले ही दिखने लगे थे, जिसका जिक्र गांधी जी ने शुरू में ही कर दिया था। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के राज तक आते-आते पार्टी में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार और घोटाले सामने आने लगे। यही कारण है कि अब तक वह अपने खिलाफ चार बड़े राजनीतिक आंदोलन झेल चुकी है।
आजादी की लड़ाई के सफल आंदोलन के बाद कांग्रेस का जन्म हुआ, लेकिन आजादी के सपने पूरे करने में वह विफल रही। इस नाकामी का केन्द्रीय कारण उसे ही कहना पड़ेगा, क्योंकि पहली जिम्मेदारी उसी की थी। कांग्रेस, पार्टी बनते ही बदलने लगी थी। बदलने के संकेत पार्टी बनने से पहले ही दिखने लगे थे, जिसका जिक्र गांधी जी ने शुरू में ही कर दिया था। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के राज तक आते-आते पार्टी में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार और घोटाले सामने आने लगे। यही कारण है कि अब तक वह अपने खिलाफ चार बड़े राजनीतिक आंदोलन झेल चुकी है।
जन आंदोलनों की लाश कंधे पर ढोता बढ़ रहा देश
लोकतांत्रिक राज में कांग्रेस के खिलाफ विफल जन आंदोलनों की फेहरिस्त है। लोहिया के समाजवाद का, संपूर्ण क्रांति, नक्सलबाड़ी और सबसे नया, अभी तक नाकाम आम आदमी के राज का आंदोलन। इन आंदोलनों का अंजाम देखें तो जैसे समंदर की लहर आती है और वापस जाते ही किनारों पर ढेरों कचरे छोड़ जाती है, वैसे ही ये जन सैलाब देश की स्थापित राजनीति के खिलाफ उमड़े, लेकिन जब थमे तो मिला कुछ नहीं, सिवाए कुछ मुर्दा नारों के। इन मरे हुए नारों, उनसे जुड़े सपनों को अपनी आंखों में लिए इस देश का आम आदमी आज भी सोता है, लेकिन हर सुबह पहले जैसी दर्दीली हकीकतें मौजूद होती हैं। कहीं कोई खास तब्दीली नहीं नजर आती। इन आंदोलनों से जनता और सरकार जगी जरूर, लेकिन मकसद पूरा नहीं हुआ।
लोहिया का आंदोलन
लोहिया ने आजादी के बाद देखे गये सपनों की नाकामी के बाद आंदोलन चलाया। सड़कों पर लोगों को एकजुट किया और नेहरू की नीतियों के खिलाफ मार्क्सवाद और गांधीवादी मिश्रित समाजवाद को आजीवन स्थापित करने में लगे रहे। जिस कांग्रेस और उसकी नीतियों के खिलाफ वह आजीवन लड़ते रहे, उन्हीं नीतियों से खुद को लोहिया का वारिस कहने वाले मुलायम सिंह जैसे नेता अक्सर मोल-भाव करते नजर आए। नेहरू जैसे बड़े राजनीतिक कद के खिलाफ जब लोग बोलने से डरते थे, तब लोहिया ने उनके खिलाफ जंग छेड़ दी थी। लोहिया का खुद नेहरू जी बहुत सम्मान करते थे। उन्हें जननेता मानते थे, लेकिन क्या यही बात मुलायम सिंह के बारे में कही जा सकती है? लोहिया के वारिस क्या उनके समाजवाद को आगे बढ़ा पाए? जवाब है नहीं। लोहिया का आंदोलन मुलायम सिंह के 'यम' फैक्टर में बदल जाता है। मुलायम जाति के नेता बनकर रह जाते हैं, लेकिन लोहियावाद आज भी जिंदा है। वह एक सच्चे, परिवर्तनकामी नेता को ताक रहा है।
नक्सलबाड़ी आंदोलन
कान्यू सान्याल ने मजदूर वर्ग और किसानों के नक्सलबाड़ी आंदोलन को नेतृत्व दिया, जिसमें अंतिम आदमी के राज का सपना देखा गया। गांधी के आंदोलन की तरह ही यह भी मौलिक था, अंतिम आदमी के न्याय के लिए था, लेकिन हिंसात्मक था। यह आंदोलन भी अपनी नाकामी के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में जूझ रहा है।
संपूर्ण क्रांति का सपना
संपूर्ण क्रांति का सपना दिखाने वाले जेपी के आंदोलन से बनीं पार्टियां, जिनकी कई टूट-फूट के बाद जनता दल और जदयू के दो चेहरे लालू और नीतीश थोड़ा बड़े फलक पर मौजूद हैं। एक खुद को सुशासन बाबू कहलाना पसंद करते हैं और एक पिछड़ों, दबे-कुचलों के मसीहा। एक 'जातीय समाजवाद' के प्रतीक हैं, तो दूसरे एक पार्टी से चिपके 'दक्षिणपंथी समाजवादी'। भारत में समाजवाद भी कई तरह का हो सकता है ये नेता साबित करते हैं।
कान्यू सान्याल ने मजदूर वर्ग और किसानों के नक्सलबाड़ी आंदोलन को नेतृत्व दिया, जिसमें अंतिम आदमी के राज का सपना देखा गया। गांधी के आंदोलन की तरह ही यह भी मौलिक था, अंतिम आदमी के न्याय के लिए था, लेकिन हिंसात्मक था। यह आंदोलन भी अपनी नाकामी के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में जूझ रहा है।
संपूर्ण क्रांति का सपना
संपूर्ण क्रांति का सपना दिखाने वाले जेपी के आंदोलन से बनीं पार्टियां, जिनकी कई टूट-फूट के बाद जनता दल और जदयू के दो चेहरे लालू और नीतीश थोड़ा बड़े फलक पर मौजूद हैं। एक खुद को सुशासन बाबू कहलाना पसंद करते हैं और एक पिछड़ों, दबे-कुचलों के मसीहा। एक 'जातीय समाजवाद' के प्रतीक हैं, तो दूसरे एक पार्टी से चिपके 'दक्षिणपंथी समाजवादी'। भारत में समाजवाद भी कई तरह का हो सकता है ये नेता साबित करते हैं।
सवाल है कि क्या जेपी की संपूर्ण क्रांति फेल हो गई? क्या सिस्टम ने इस आंदोलन के वारिसों को लील लिया? जवाब है हां। लालू को जब सत्ता मिली तो उन्होंने दबे-कुचले लोगों को हिम्मत दी, आवाज दी, उनके हक के लिए लड़े। यह भी बड़ी बात है, लेकिन संपूर्ण क्रांति का क्या हुआ? कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले जेपी के वारिस भ्रष्ट क्यों हो गए? दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी परिवर्तनकामी पार्टियां कांग्रेस की क्षेत्रीय शाखाएं भर बनकर रह गईं। सत्ताजनित कांग्रेस की बीमारी सबको लगती गई। सबको सिस्टम अपने में ढालता गया। संपूर्ण क्रांति का सपना जातीय समता से भी आगे जाता है, पर वह दम तोड़ चुका है। लालू, नीतीश दोनों पर गबन, घोटालों के आरोप लग चुके हैं। एक बिहार में बदलाव के नाम पर कभी इस पार्टी से, तो कभी उस पार्टी से गांठ बांधते हैं, तो एक एक चारा घोटाले में दूसरी बार अंदर हैं और दूसरे सत्ता से चिपक कर सुरक्षित हैं।
जेपी का सपना देश में संपूर्ण बदलाव का था। भ्रष्ट सिस्टम उखाड़कर साफ-सुथरा, सबके भले का देश बनाना था। इनके वारिस लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, शरद यादव, रविशंकर प्रसाद, जिनमें ज्यादातर देश बदलने के बजाय दिल्ली के लुटियन जोन में बंगले बदल रहे हैं।
यहां कांशीराम के सपनों की पार्टी बसपा का भी जिक्र करना वाजिब होगा। सामाजिक न्याय के लिए बनी शोषितों की इस पार्टी में भी कांग्रेस के सारे लक्षण आ गए हैं! न्याय के लिए अन्याय यहां भी जारी है।
आम आदमी के राज का सपना
ताजा तरीन आंदोलन अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल के लिए हुआ। रामलीला मैदान में आंदोलन की शक्ल काफी कुछ जेपी आंदोलन जैसी थी। कांग्रेस-भाजपा, बाकी सभी पार्टियों के नेताओं को चोर, भ्रष्ट बताया गया। आखिर में आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ। पहली बार चुनाव लड़ी, 70 में से 28 सीट जीतकर सभी को चौंका दिया। अपनी शर्तों पर सरकार चलाने की जिद पर जनता से पूछकर कांग्रेस का समर्थन लेकर सरकार बनाई। अपने शुरुआती तीन मुद्दों पर काम करते हुए बिजली के दाम आधे किए और पानी माफ किया। 49 दिन में जनलोकपाल ना पारित होने पर केजरीवाल ने इस्तीफा देकर शहादत का जामा पहना और फिर चुनाव की मांग कर बैठे।
डेढ़ साल बाद 2015 में दोबारा चुनाव हुआ। लैंडस्लाइड जीत दर्ज करते हुए 70 में से 67 सीटें जीत कर दोबारा सरकार बनाई। लेकिन केजरीवाल इस अपार सफलता को पचा नहीं पाए। आंदोलन के मूल्यों और जमीर से समझौता शुरू किया। पार्टी की रीति-नीति, दशा-दिशा और छवि तय करने वाले पार्टी के सीनियर फाउंडर मेम्बर, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, प्रो. आनंद कुमार जैसे बड़े नेताओं को बाहर किया। पार्टी के लोकपाल को हटाया। यह एक तरह से बाजार में बिकने वाले एडिडास, नाइकी के नकली जूतों की तरह बनकर रह गई। एक झटके में जनांदोलन से उपजी आम आदमी की पार्टी केजरीवाल एंड कम्पनी की बन गई।
यह एक और आंदोलन की विफलता है, जो नए भारत में एक त्रासदी की तरह घट रही है। जनता से पूछकर फैसले लेने, सत्ता आम आदमी के हाथ में देने, भ्रष्टाचार पर खुद को भी ना बख्शने, पार्टी लोकपाल की निगरानी में चलाने जैसे आंदोलन के दौरान किए गए वादे ढकोसले साबित हुए।
अभी हाल ही में राज्यसभा के लिए उम्मीदवार तय करने में यह पार्टी आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोपों की भी जद में आ गई, जिसके खिलाफ वह जन्मी है। गुप्ता बंधुओं को राज्यसभा का उम्मीदवार क्यों बनाया, इसकी वाजिब सफाई पार्टी अभी तक नहीं दे पाई है। जबकि पार्टी में उनसे योग्य, संघर्षशील उम्मीदवार मौजूद हैं। इन बंधुओं को 100 करोड़ में टिकट बेचने का आरोप पता नहीं कितना सही है, लेकिन लोग ऐसा ना मानें, इसका कोई कारण नजर नहीं आता। यह एक ऐसी पार्टी कर रही है, जिसे चुनाव में 20 करोड़ चंदा मिलने के बाद कहना पड़ा था कि बस अब और नहीं चाहिए।
तो क्या माना जाए कि यह पार्टी भी बाकी पार्टियों की तरह पूंजीपतियों के ही सहारे चलेगी? यह कैसी वैकल्पिक राजनीति हुई? चले थे विकल्प देने, मगर आप भी उसी राह पर चल पड़े। यह एक बार और आम आदमी के सपनों का मरना है।
स्वराज इंडिया
इस आंदोलन को बचाने के लिए योगन्द्र यादव ने प्रशांत भूषण के नेतृत्व में पहले स्वराज अभियान संगठन बनाया और बाद में स्वराज इंडिया पार्टी। बेशक अभी तक उनकी लड़ाई में आंदोलन जिंदा दिखता है, लेकिन वह आम जनता का भरोसा अभी जीत नहीं पाये हैं। उम्मीद कीजिए कि पार्टी आंदोलन को बचाकर रखेगी।
आखिर जन आंदोलनों की विफलता कब तक?
आप आंदोलनों की असफलता के कारण तलाशें तो पाएंगे कि कथनी-करनी में फर्क रखने वाले जब तक नेतृत्व देंगे, तब तक आंदोलन विफल होते रहेंगे। गांधी जैसे कर्मनिष्ठ, अंतिम आदमी के लिए समर्पित शख्सियत के नेतृत्व के बिना आंदोलन विफल होते रहेंगे। बदलाव के लिए जान देने वाले भगत सिंह और उनके साथियों जैसे परिवर्तनकामी लोगों के नेतृत्व के बिना बदलाव संभव नहीं। जेपी, लोहिया में भी गांधी, मार्क्स का अक्स देखा जा सकता था, लेकिन अफसोस है कि आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने तक वे नहीं रहे। उनके वारिसों ने आंदोलन का खूब रायता बनाया।
आप आंदोलनों की असफलता के कारण तलाशें तो पाएंगे कि कथनी-करनी में फर्क रखने वाले जब तक नेतृत्व देंगे, तब तक आंदोलन विफल होते रहेंगे। गांधी जैसे कर्मनिष्ठ, अंतिम आदमी के लिए समर्पित शख्सियत के नेतृत्व के बिना आंदोलन विफल होते रहेंगे। बदलाव के लिए जान देने वाले भगत सिंह और उनके साथियों जैसे परिवर्तनकामी लोगों के नेतृत्व के बिना बदलाव संभव नहीं। जेपी, लोहिया में भी गांधी, मार्क्स का अक्स देखा जा सकता था, लेकिन अफसोस है कि आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने तक वे नहीं रहे। उनके वारिसों ने आंदोलन का खूब रायता बनाया।
नये युवा नेतृत्व से उम्मीद
अभी देश में युवाओं का एक नया नेतृत्व उभर रहा है। कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी, शेहला रसीद का। ये किसी पार्टी के नेता नहीं हैं। ये स्वाभाविक आंदोलन को नेतृत्व दे रहे हैं। दिल्ली की हुंकार रैली में सत्ता के खिलाफ सड़कों पर विपक्ष खड़ा होगा, ऐसी उम्मीद जगाते हैं। इस नेतृत्व में एक नेता विधायक बनने के बाद भी आंदोलन के तेवर में है, जो सपर्पित नेतृत्व के यकीन को थोड़ा और पुख्ता करते हैं। उम्मीद कीजिए कि ये बदलाव को अंजाम तक ले जाएंगे और सिस्टम के पुर्जे नहीं बनेंगे।
आन्दोलन से जन्मी पार्टियों की नाकामी के आर्थिक कारण
अभी देश में युवाओं का एक नया नेतृत्व उभर रहा है। कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी, शेहला रसीद का। ये किसी पार्टी के नेता नहीं हैं। ये स्वाभाविक आंदोलन को नेतृत्व दे रहे हैं। दिल्ली की हुंकार रैली में सत्ता के खिलाफ सड़कों पर विपक्ष खड़ा होगा, ऐसी उम्मीद जगाते हैं। इस नेतृत्व में एक नेता विधायक बनने के बाद भी आंदोलन के तेवर में है, जो सपर्पित नेतृत्व के यकीन को थोड़ा और पुख्ता करते हैं। उम्मीद कीजिए कि ये बदलाव को अंजाम तक ले जाएंगे और सिस्टम के पुर्जे नहीं बनेंगे।
आन्दोलन से जन्मी पार्टियों की नाकामी के आर्थिक कारण
आंदोलनों से जन्मी पार्टियों की नाकामी के बड़े आर्थिक कारण भी हैं। सबसे अहम कारण यह है कि जब तक सभी पार्टियों का चुनावी संचालन चुनाव आयोग नहीं करता और इनके आर्थिक संसाधनों में पारदर्शिता नहीं तय होती, तब तक पार्टियां सिस्टम की बगलगीर बनती रहेंगी, आंदोलन विफल होंगे, मरते रहेंगे। साफ-सुथरे चुनाव के बिना सपने पैसे की भेंट चढ़ते रहेंगे।
चुनावी भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए मोदी सरकार अब ऐसी व्यवस्था लेकर आई है, जिसमें चंदा देने वाले का नाम ही सार्वजनिक नहीं होगा। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने चंदा देने के बॉंड सिस्टम का ऐलान किया है, जिसमें चंदा देने वाले को अपना नाम बताने की जरूरत नहीं होगी। इससे चुनाव में पारदर्शिता बढ़ने के बजाय भ्रष्टाचार बढ़ेगा। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति का कहना है कि इससे चुनावी चंदे में पारदर्शिता को बढ़ावा नहीं मिलेगा और राजनीतिक पार्टियों व कॉर्पोरेट के बीच सांठ-गांठ बनी रहेगी। फिलहाल, भ्रष्टाचार के खिलाफ बीजेपी की लड़ाई वही ढाक के तीन पात, नौ दिन चले आढ़ाई कोस वाली है।
मार्क्स ने कहा था-
मार्क्स ने कहा था कि समाजवाद पूरी तरह तब तक स्थापित नहीं हो सकता, जब तक कि समाज वर्गविहीन नहीं हो जाता। मार्क्स ने बुर्जुआ यानि शोषक और सर्वहारा यानि शोषित दो वर्ग बताए थे। कहा था कि शोषक वर्ग अपनी सत्ता को और बढ़ाने के लिए विरोधी वर्ग का शोषण करेगा। विरोधी वर्ग अधिक शोषण होने पर अपनी इकट्ठी ऊर्जा से शोषक वर्ग के खिलाफ आंदोलन करेगा। इससे वर्ग समाप्त हो जाएगा।
लेकिन आधुनिक राजनीति में शोषित वर्ग के आंदोलन से निकले लोग ही सत्ता प्राप्त कर शोषक वर्ग की तरह हो जाते हैं। वह समाज व्यवस्था संचालन के लिए सत्ता इकट्ठी ना करें तो उनके समांनांतर शक्ति सम्पन्न वर्ग जो पहले से मौजूद है, उन्हें समाप्त कर देगा। यही अाधुनिक राजनीतिक व्यवस्था की मजबूरी है। आंदोलनों से नए लोग सामने आते हैं, जो कुछ समय तक समाज में परिवर्तन लाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद परंपरागत राजनीतिक खांचे में ढलते जाते हैं। इसी तरह आंदोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी कुछ समय वैकल्पिक राजनीति देती नजर आई, लेकिन धीरे-धीरे वह भी परंपरागत राजनीति का हिस्सा बन चुकी है। इस कारण ऐसा समाज, जिसमें सबको समान अधिकार प्राप्त हों की स्थापना करना संभव नहीं हो पाता।
मार्क्स ने कहा था-
मार्क्स ने कहा था कि समाजवाद पूरी तरह तब तक स्थापित नहीं हो सकता, जब तक कि समाज वर्गविहीन नहीं हो जाता। मार्क्स ने बुर्जुआ यानि शोषक और सर्वहारा यानि शोषित दो वर्ग बताए थे। कहा था कि शोषक वर्ग अपनी सत्ता को और बढ़ाने के लिए विरोधी वर्ग का शोषण करेगा। विरोधी वर्ग अधिक शोषण होने पर अपनी इकट्ठी ऊर्जा से शोषक वर्ग के खिलाफ आंदोलन करेगा। इससे वर्ग समाप्त हो जाएगा।
लेकिन आधुनिक राजनीति में शोषित वर्ग के आंदोलन से निकले लोग ही सत्ता प्राप्त कर शोषक वर्ग की तरह हो जाते हैं। वह समाज व्यवस्था संचालन के लिए सत्ता इकट्ठी ना करें तो उनके समांनांतर शक्ति सम्पन्न वर्ग जो पहले से मौजूद है, उन्हें समाप्त कर देगा। यही अाधुनिक राजनीतिक व्यवस्था की मजबूरी है। आंदोलनों से नए लोग सामने आते हैं, जो कुछ समय तक समाज में परिवर्तन लाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद परंपरागत राजनीतिक खांचे में ढलते जाते हैं। इसी तरह आंदोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी कुछ समय वैकल्पिक राजनीति देती नजर आई, लेकिन धीरे-धीरे वह भी परंपरागत राजनीति का हिस्सा बन चुकी है। इस कारण ऐसा समाज, जिसमें सबको समान अधिकार प्राप्त हों की स्थापना करना संभव नहीं हो पाता।

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