प्रधानमंत्री का क्या होगा?


 यह देश गांयह देश गांधी जी के तीन बंदरों में बड़ा विश्वास करता है। और शायद यही कारण है कि इस देश को गूंगा, बहरा और अंधों का देश कहा जा सकता है। गांधी जी के तीन बंदरों में से एक बुरा नहीं देखता है। इसलिए वह सदा अपनी आंखो पर हाथ रखे रहता है। दूसरा बुरा नहीं सुनता है, इसलिए वह सदा अपने कानों को बंद किए रहता है। तीसरा बंदर बुरा नहीं कहता है, इसलिए वह सदा अपने ही हाथों से अपना मुंह बंद किए रहता है। प्रंधानमंत्री, गांधी जी के दो शुरुआती बंदरों का मिला जुला संस्करण बन गए है। बेशक वे बहुत अच्छे और बेदाग इन्सान हैं । देश लेकिन सारे घोटाले उनकी नाक के नीचे हो रहे हैं ये कहाँ तक जायज है? उन्हे ना तो अपनी सरकार में कुछ बुरा दिखता है। और ना ही वें उसके बारे में कुछ सुनना चाहते है। इसलिए उन्होने अपनी आंखे और कान अपने ही हाथों से बंद कर लिए है। अपनी सरकार के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कुछ कहने के मामले में माननीय मनमोहन सिंह गाँधी जी के तीसरे बंदर का बखूबी अनुसरण कर रहें हैं। 
     
     पूरी कांग्रेस पार्टी कह रही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संत है। उनका किसी भी घोटाले से कुछ लेना देना नहीं है । इसलिए उनके ऊपर कीचड़ नहीं उछाला जा सकता है। लेकिन कांग्रेस पार्टी और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से यह देश कुछ सवाल पूछना चाहता है। जिनमें से एक सवाल तो यह है कि संतों का राजनीति में काम क्या है? अगर वे संत है तो कहीं गुफा में या किसी तपोवन में जाकर तपस्या क्यों नहीं करते? यहां राजनीति जैसे महायुद्ध में तपस्वियों का क्या काम है? प्रधानमंत्री जैसे महत्तवपूर्ण पद पर उस आदमी को ही बैठना चाहिए जो दस आंखों से देख सके, और दस कानों से सुन सके। साथ ही दस हाथों से काम भी कर सके। राजनीति करना किसी संत के बस की बात नहीं है। इसलिए अगर वह संत होने का दावा करते है तो उन्हे संतों की जगह बैठना चाहिए, प्रधानमंत्री जैसे सर्वाधिक महत्तवपूर्ण पद पर नहीं।
       दूसरी बात जो इस देश की जनता जानना चाहती है। वह यह है कि जब इस सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री है तो वे निर्दोष कैसे हो सकते है ? इस देश की जनता ने किसी ए राजा या किसी कलमाड़ी को तो आम चुनाव में जनादेश नहीं दिया था? इस देश की जनता ने सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जनादेश दिया था। क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव इन्ही दो नामों का आगे करके लड़ा था। इसलिए देश की जनता के सामने सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री की जवाबदेही कहीं ज्यादा बनती है बनिस्बत किसी ए राजा या सुरेश कलमाड़ी के। और ये दोनों ही अपनी जबावदेही से बच नहीं सकते है।
      तीसरी बात, इस देश के लोग यह जानना चाहते हैं कि  उनके नेतृत्व में चल रही सरकार में घोटालों के रिकॉर्ड क्रिकेट के स्कोर की तरह क्यों बढ़ रहे हैं? एक घोटाले की चर्चा खत्म नहीं होती है कि अचानक से दूसरा महाघोटाला सामने आ जाता है। उनकी सरकार का कोई ऐसा मंत्रालय बचा भी है जिसके माथे पर घोटाले का तमगा न लगा हो? कहीं ऐसा तो नहीं है कि प्रधानमंत्री जी ने चुपचाप कोई ऐसा कानून बना दिया हो जिससे सरकारी मंत्रालयों को घोटाले करने का वैधानिक हक मिल गया हो? और जिस कानून के बारे में देश की जनता को अभी नहीं बताया गया हो? अगर ऐसा है तो फिर उस कानून की सीमा को बड़ा कर देना चाहिए।
                                                                           
       मनमोहन सिंह को यह याद रखना चाहिए कि आज वे खुद के सुकून के लिए कुछ भी कहे और अपने को संत बताए या महापुरूष लेकिन यह देश उनकी लाचारगी के लिए उन्हे कभी माफ नहीं करेगा। उन्हे यह भी याद रखना चाहिए कि सोनिया गांधी से ज्यादा जिम्मेदार इतिहास उन्हे ही ठहराएगा क्योंकि इस देश में नेहरू-गांधी परिवार को संविधान से अलग कुछ ऐसे विशेषाधिकार मिले हुए है, जो किसी दूसरे को कभी नहीं मिल सकते। इन अधिकारों की आड़ में सोनिया तो बच निकलेगी, लेकिन हमारे संत प्रधानमंत्री का क्या होगा? 

टिप्पणियाँ

  1. hamare yaha to puri rajniti ek pariwar ke paas simat ker rah gai lekin usme kam dosh hamara nahi hai ager ek loktantrik desh ka pradhanmantri itna kupmanduk hai to uske liye janta bhi to kahi na kahi jimeddar hai

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