राजनीति का भक्ति और झाड़-फूक काल।



राजनीति का भक्ति और झाड़-फूक काल।
‌आप प्रवचन से ईश्वर का अनुभव करने की कोशिश किए होंगे या अकेले में बैठकर ईश्वर का ध्यान लगाए होंगे। आप आंखें बंद करते हैं और बिना किसी आकार वाले या फिर किसी काल्पनिक आकार वाले ईश्वर की कल्पना करते हैं। आप यहां तक कल्पना करते हैं कि वह बिल्कुल आपकी तरह सजीव है और उसमें असीम शक्ति, असीम सोच, सर्वज्ञ, सर्व शक्तिमान है। ये सब आप काल्पनिक तौर पर करते हैं और इसी पर पूरा यकीन कर उस काल्पनिक सर्वसत्ता से विनती करते हैं, याचना करते हैं, उसकी वंदना करते हैं। उससे बहुत कुछ मांगते हैं। गलतियों पर उससे माफी भी मांगते हैं। अपनी नाकामियों पर उससे काल्पनिक शक्ति प्राप्त करते हैं और काल्पनिक तौर पर आप पहले से अधिक उर्जा महसूस करते हैं।
    अभी राजनीति का हाल भी कुछ ऐसा ही है। भक्ति में जैसा कुछ होता हुआ लगता है वैसे अभी राजनीति में कुछ होते हुए लग रहा है। कुछ बताया जा रहा है, लेकिन करके दिखाया नहीं जा रहा? अगर दिखाया भी जा रहा है तो तंत्र-मंत्र की तरह। मतलब कुछ कवायद करते दिखाया जा रहा है और बताया जा रहा है कि इसी से आपका कुछ होगा और लोग मान ले रहे हैं कि इसी से कुछ होगा।
   बाकि लगभग तीन साल से जो कवायद हुई उससे ठोस और भौतिक तौर पर क्या परिणाम निकला, नहीं पता चला? लेकिन यह माना जा रहा कि इससे कुछ हुआ या हो रहा है। हो नहीं रहा कुछ, बस होता हुआ लग रहा।
आइये झाड़-फूक पर आते हैं
आप ओझा को देखें होंगे भूत उतारते हुए। नजदीक से नहीं तो टीवी चैनलों के सनसनी शो में जरूर देखें होंगे। मनोविज्ञान कहता है भूत मन का वहम होता है, यानि कि किसी नकरात्मक काल्पनिक शक्ति से कुछ ऊट-पटांग होता हुआ महसूस होता है। इससे कोई भी ऊट-पटांग सोचने लगता है और वैसा ही ऊट-पटांग हरकतें भी करने भी लगता है।
   ओझा जिसका भूत उतारता है, उसे सामने बैठाता है। उसका सिर पकड़कर तरह-तरह के मंत्र बड़बड़ाता है। सिर के चारों तरफ कुछ लवांग, फूल से भूत को मनाता है। विनती करता है और छोड़कर जाने को कहता है। फिर आंखें बंदकर चेक करता है कि भूत गया कि नहीं? कई हिचकियां लेता है और बताता है कि अभी भूत नहीं गया है।
   ओझा फिर अपना रौद्र रूप धारण करता है और रोगी के सिर को कस-कस के पकड़ता और झटकता है। तेज-तेज आवाज में, भारी, उच्च स्वर में मंत्र पढ़ता है। अपने बड़े-बड़े देवताओं को बुलाता है और रोगी के ऊपर काल्पनिक तौर पर चढ़ाता है। जैसे- जय काली कलकत्ते वाली, जाओ मां इसके ऊपर से भूत को भगा दो। तेजी से रोगी का सिर दबाकर उस पर काली मां की चढ़ाई कराता है और धीरे-धीरे सिर का दबाव हलका करता जाता है और मंत्र पढ़ता जाता और कहता है कि जा भाग, जा भाग। इससे रोगी के मन का वहम दूर हो जाता है। रोगी को भी लगने लगता है कि हां कुछ वह पहले से अच्छा महसूस कर रहा. कुछ था जो उतर गया और भूत गायब!
    इसी तरह अभी की राजनीति में लोगों के मन में मनोवैज्ञानिक तौर पर ऊट-पटांग बातें बैठाई जा रहीं और लोग उन बातों को मान रहे हैं और असामाजिक हरकतें कर रहे हैं। जनता की समस्या है कुछ, पर उसके मन में बिठाया जा रहा कुछ और। वह यह मानने भी लग रही हैं कि उसकी समस्या वही है, जो उसे बताया जा रहा है। लोगों के मन में एक दहशत पैदा की जा रही है और वे मान ले रहे हैं कि यह समस्या ठीक हो जाय, तो सब ठीक हो जाएगा।   
‌       सरकार अपनी सुविधा के हिसाब खुद मुद्दे खड़ा कर रही है और उसे ठीक कर रही है और जनता मान ले रही है कि हां यही उसका मुद्दा है। पर सवाल ये है कि जनता कब तक इस आभासी मुद्दे को हल मानकर काम चलाएगी? क्या अगले दिन उसके मन में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जीने के जद्दोजहद जैसे जरूरी सवाल नहीं उठेंगे? क्या इनका हल नहीं खोजेगी? जरूरी अधिकारों की मांग नहीं करेगी? जरूरी सवाल जब उसकी प्राथमिकता में आ जाएंगे तो जनता झाड़- फूक से तो काम चलाती रहेगी, लेकिन असली डॉक्टर भी खोजेगी!



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