तमाशाई बदसलूकी

    नकारा पुलिस – प्रशासन की पीड़ादायी घटना जिसने दिल को दहला दिया। पुलिसिया जुल्म से दो-चार होने की घटनाएँ आम बात हो गई हैं। एक ट्रक ड्राइबर के साथ पुलिस ने जिस तरह से अमानवीय बदसलूकी की वह मानवाधिकार का सरेआम उल्लंघन है। इससे भी ज्यादा अफसोसनाक खुद को सभ्य समझने वाली तमाशाई भीड़ की चुप्पी और उसका पुलिसिया कहर के पक्ष में खड़े होना, मानवीयता का क्रूरतम मजाक है !
   सुलतानपुर जिले की जानी-मानी तहसील लम्भुआ बाजार में एक ट्रक ड्राइबर को पुलिस और स्पेक्टर ने मिलकर लाठी, लात-घूसों से घसीट – घसीटकर करीब आधे घंटे तक इसलिए पीटते रहे कि ड्राइबर शराब पीकर गाड़ी चला रहा था। बेशक शराब पीकर गाड़ी चलाना एक दण्डनीय अपराध है। लेकिन दण्ड का अधिकार क्या बहशी पुलिस को है ? क्या यह ह्यूमन राइट के खिलाफ नही है ? पुलिस की दलील यह थी कि ड्राइबर शराब के नशे में गाली दे रहा था।
                                                               
    दरअसल अपनी बदसलूकी को सही ठहराने के लिये इस तरह का बहाना गढ़ना पुलिस का चर्चित शगल है । यह बहाना सरासर गलत है क्योंकि मै इस घटना का साक्षी रहा । मेरे विरोध जताने पर मुझे भी धमकियाँ मिलने लगी । मैं अपने को उस समय बहुत मजबूर पाया । वह पुलिस और स्पेक्टर को गाली देना तब शुरू किया जब पुलिस का कहर अत्यन्त पीड़ादायी और असहनीय हो गया और वह चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगा कि मार मुझे जितना मारना हो ?
   दरअसल, उसका ट्रक तकनीकि खराबी से बाजार के बीचोंबीच रूक गया था। जिसकी वजह से जाम लग गया था। वह ट्रक को किनारे लगाने के लिये भरसक कोशिश में लगा था। जबकि पुलिस उसके ट्रक को आगे–पीछे से पीट रही थी और उसे गाली भी दे रही थी। तभी उसने कहा कि साहब मैं क्या करूँ, गाड़ी के शीशे पर मत मारिये शीशा टूट जायेगा। यह गाड़ी ऐसे – वैसे मालिक की नही है। यही बात उसके जी का जंजाल बन गई।
   काफी जद्दोजहद के बाद जब उसने गाड़ी को जाम से बाहर निकाला तो पुलिस और स्पेक्टर ने दौड़ाकर उसकी ट्रक को चारो तरफ से घेर लिया। जैसा कि अक्सर होता है। उसे नीचे उतारा। वह हाथ जोड़ते हुए नीचे उतरा और गिड़ागिड़ाकर माफी मांगने लगा। साहब मुझे छोड़ दीजिये मुझसे गलती हो गई। मेरी गाड़ी खराब हो गई मैं क्या करूँ। मुझे छोड़ दीजिये।
  लेकिन पुलिस ने उसे लाठी, लात–घूसों से जी-भर के पीटा। उसके कपड़े फट गये। पुलिस की हैवानियत के कारण उस पर बरसी अनगिनत लाठियों और लात-घूसों से खून जमने के कारण पूरा शरीर काला हो गया। उसका एक हाथ भी टूट गया। उसके बाद पुलिस उसे थाने ले गई। वहाँ न जाने उस पर कितना कहर ढाई होगी ! और इसमें भी कोई शक नहीं की थाने ले जाने के पीछे का मकसद आर्थिक चढ़ावे का रहा हो ?   
   उधर तमाशाई भीड़ भी जिसमें कुछ स्वघोषित नेता मूकदर्शक(तमाशाबीन) पुलिस के पक्ष में खड़े थे। यहाँ सवाल खड़ा होता है कि क्या खुद पुलिस शराब पीकर गाड़ी नही चलाती? क्या तमाशाबीन भीड़ और स्वघोषित नेता शराब पीकर गाड़ी नही चलाते? अगर चलाते हैं तो क्या पुलिस उनके साथ भी ऐसा ही तमाशाई व्यवहार करती है? हलांकि यह एक अपराध है लेकिन क्या पुलिस इस अपराध के लिये मारने – पीटने और सजा देने का हक रखती है ? क्या वह कानून से ऊपर है ?
   दरअसल सच्चाई यह है कि पुलिस ने उसे इसलिये पीटा क्योंकि वह धन बल से कमजोर था। यह भी उतना ही सच है कि पुलिस उन सारे निकृष्टतम कुकर्मों में लिप्त रहती है जिस दलील के आधार पर उसने ड्राइबर की बेरहमी से पीटाई की। और तमाशाई भीड़ भी, जो कि कहर ढाती पुलिस के पक्ष में खड़ी थी।
  जबकि होना तो यह चाहिए था कि ड्राइबर को आर्थिक दण्ड दिया जा सकता था । उसे सजा दिलाई जा सकती थी। लेकिन मारने–पीटने का हक तो पुलिस को तो तब तक नही है जब तक कि वह खुद को असुरक्षित महसूस न करे। वह लोगों की रक्षक की जगह भक्षक का काम करती नजर आई।
   एक तरफ पुलिस से दोस्ताना व्यवहार की अपेक्षा की जाती है वहीं दूसरी तरफ वह आतंक पर तुली रहती है। सच तो यह है कि गुण्डें दबंगो का काम उसने अपने हाथों में ले रखा है, बिलकुल तानाशाही जैसा।
   वास्तव में पुलिस आज भी सामन्ती मनोदशा से ऊपर नही उठ पाई है। वह आज भी बुर्जुआ(सामन्ती) वर्ग के हित सेवा में लगी रहती है और असहायों, गरीबों के जमीर के साथ खिलवाड़ कर तमाशा खड़ी करती रहती है !!

टिप्पणियाँ

  1. iske bad bhi to hamara desh mahan hai berberta ki had hai yaha is samjik parivesh me rahte huye kaise hum bharat mata ki jay bolte hai meri samajh ke pere hai kaise log hai yaha jo kuchha bhi samjhna dekhna nahi chahte .kisi bhi galat baat k liye aawaz nahi uthate sirf is der se ki kahi hum fas na jaye aur yahi der hume paten ki or le ja raha hai

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