जन आंदोलनों की विफलता कब तक?
जन आंदोलनों की विफलता कब तक? जब सरकारें या सत्ताएं लोगों के अधिकार सुनिश्चित करने में विफल होती हैं और इससे लोगों में असंतोष बढ़ता है तो आंदोलन आखिरी रास्ता होता है। आंदोलन से आदमियत की नई स्थापना होती है। यह व्यवस्था के लुंज-पुंज पुर्जों को ठीक करता है या फिर पूरी व्यवस्था को ही बदल देता है। झुंड, कबीले, राजतंत्र, लोकतंत्र के अपने अलग-अलग चरणों में पूरी मानव सभ्यता संघर्ष और आंदोलन का ही नतीजा है। फिलहाल, यहां आजादी के पहले और उसके बाद मोटे तौर पर पांच बड़े जन आंदोलनों के हश्र और हासिल की पड़ताल करते हैं। अंग्रेजों के खिलाफ कांग्रेस का आंदोलन और इसके बाद मोटे तौर पर कांग्रेस के ही खिलाफ लोहिया, नक्सलबाड़ी, जेपी और लगभग पांच साल पहले अन्ना हजारे का आंदोलन। इन आंदोलनों से बनी सभी पार्टियों का अंजाम देखें, तो पाएंगे सबको सिस्टम लीलता गया या कहें सभी सिस्टम की बगलगीर होती गईं। कांग्रेस का आंदोलन आजादी की लड़ाई के सफल आंदोलन के बाद कांग्रेस का जन्म हुआ, लेकिन आजादी के सपने पूरे करने में वह विफल रही। इस नाकामी का केन्द्रीय कारण उसे ही कहना पड़ेगा, क्योंकि पहली जिम्मे...